2025 के संदेश और भविष्य के संकेत

2025 जाते-जाते वैश्विक शक्ति संतुलन में निर्णायक परिवर्तन का संकेत दे दिया है। दुनिया नए विश्व ऑर्डर के निर्माण के दरवाजे पर खड़ी है। पिछले 35 वर्षों से विश्व पर कायम अमेरिकी हेजीमोनी को चीन से कड़ी चुनौती मिलने लगी है। 2025 का संदेश है कि दुनिया युद्धक हथियारों और सैन्य शक्ति से तय होने वाले निर्णायक संतुलन की मंजिल से आगे बढ़कर तकनीक मैनुफैक्चरिंग उत्पादन वितरण और बाजार की सर्वथा गतिमान सभ्यता के राह से आगे बढ़ेगी। जो देश और समाज इस निर्णायक परिवर्तन को समझ लेगा। वही आने वाले समय में दुनिया का नेतृत्व करेगा। घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया है कि सिर्फ परमाणु शस्त्रों की शक्ति द्वारा विश्व पर वर्चस्व कायम रखना संभव नहीं है। 

इस सदी के शुरुआत से ही अमेरिकी खेमे द्वारा वर्चस्व बनाये रखने के लिए व्यापारिक और आर्थिक प्रतिबंधों को हथियार के बतौर‌ प्रयोग किया गया था। जिससे कई देशों में भारी तबाही देखी गई। उनका विकास रुक गया और भारी मानव त्रासदी पैदा गई। अमेरिकी नेतृत्व में पश्चिमी दुनिया का यह हथियार अब उन पर पलटवार करने लगा है। जब ट्रंप ने टैरिफ को हथियार के बतौर प्रयोग किया तो चीनी प्रतिक्रिया से पश्चिम हतप्रभ रह गया। 

एक ध्रुवीय दुनिया में साम्राज्यवादी पूंजी के स्वच्छंद विचरण के लिए एलपीजी लागू की गई। विश्व बैंक विश्व व्यापार संगठन द्वारा तीसरी दुनिया के देशों की बांह मरोड कर खुलवाये गए राष्ट्रीय बाजार के दरवाजे के बाद वित्तीय पूंजी ने विकासशील देशों  की तरफ‌ रुख किया। कॉर्पोरेट घराने पश्चिम से विकासशील देशों की तरफ अपने उद्योग स्थानांतरित करने लगे। कच्चे माल सस्ता श्रम बाजार तथा विशाल उपभोक्ता बाजार की लालच में उन्होंने तीसरी दुनिया में उन तत्वों को प्रवेश करा दिया।

जिसके बल पर साम्राज्यवादी पूंजी दुनिया पर अपना नियंत्रण कायम किए हुए थी। आज एलपीजी उल्टा परिणाम दे रही है। उच्च तकनीक से जुड़ते‌ ही साउथ ग्लोबल ने पश्चिमी साम्राज्यवादी वर्चस्व को चुनौती दे दी। आज चीन, वियतनाम, साउथ कोरिया, बांग्लादेश आदि देश मैन्युफैक्चरिंग हब बन गये हैं। ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका ताइवान सहित कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं छलांग लगा रही हैं। जिससे पश्चिम के लिए गंभीर चुनौती खड़ी हो गई। 2025 इस परिवर्तन के वैश्विक स्वीकृति का निर्णायक वर्ष रहा। 

व्यापार युद्ध के अमेरिकी हथियार को चीनी समाजवादी उत्पादन प्रणाली ने अमेरिका से छीन लिया है। जिसे ट्रंप द्वारा छेड़े गए टैरिफ वार के दौरान चीन की प्रतिक्रिया में देखा गया। जब चीन ने “रेयर अर्थ” की सप्लाई को रोक कर अमेरिकी उद्योगों को ठप कर देने का प्रयास किया। इस तरह के चमत्कार को 2025 में ही घटित होना था। वस्तुतः यह विश्व शक्ति संतुलन में ऐतिहासिक मोड़ था।

दूसरा वैश्विक पटल पर ग्लोबल साउथ के अभ्युदय ने पश्चिमी जगत को गंभीर चुनौती दी है। औपनिवेशिक गुलामी से आजाद देशों ने एलपीजी के बाद बन रही नई विश्व व्यवस्था में तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है। आज वैश्विक उत्पादन का बड़ा भाग ग्लोबल साउथ से आता है। जिस कारण से सकल वैश्विक उत्पादन में उनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है। जो अब 46% के करीब पहुंच गई है। दुनिया के उपभोक्ता बाजार में ग्लोबल साउथ की तूती बोल रही है।

पश्चिम अब सिर्फ हथियारों ऑटोमोबाइल रिसर्च यानी बौद्धिक संपदा तथा आधुनिक आईटी शक्ति पर ही निर्भर है। जिसके द्वारा वह विश्व पर नियंत्रण बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है। लेकिन चीन सहित ग्लोबल साउथ के देश भी इस क्षेत्र में नई सफलताएं हासिल कर रहे हैं। अमेरिकी आईटी कंपनियों को चीनी आईटी कम्पनियों से‌ कड़ी चुनौती मिल रही है।  उत्पादन का ऐसा कोई सेक्टर नहीं है जहां 2025 तक आते-आते साउथ ग्लोबल से अमेरिकी ब्लॉक को कड़ी टक्कर न मिल रही हो।

औपनिवेशिक लूट की पश्चिमी प्रणाली हथियार युद्धक विमान विमानन उद्योग मिसाइल पेट्रोल डॉलर आदि की शक्ति को अप्रासंगिक करते हुए चीनी कम्पनियां मैन्युफैक्चरिंग के द्वारा अमेरिकी वर्चस्व को  2025 में तोड़ते हुए दिखाई देने लगी हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने उन्नत युद्ध तकनीकी क्षमता भी दिखाई दी। जिसे लेकर अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ चिंतित दिखाई दे रहे हैं। 

फिलिस्तीन की जनता के बहादुराना संघर्ष और आजाद मुल्क के लिए सर्वस्व कुर्बान करने की जिजीविषा ने अमेरिकी इजरायल धुरी के युद्ध केन्द्रित विश्व रणनीति को जिस तरह से चुनौती दी है। वह इतिहास का बेमिसाल प्रतिरोध है।उससे लंबे समय से चली आ रही अमेरिकी सैन्य केंद्रित विश्व रणनीति को भारी धक्का लगा है। वही यूक्रेन को आगे कर नाटो के विस्तार द्वारा यूरोप में खड़ी की जाने वाली नई सुरक्षा दीवार की पश्चिमी रणनीति को मुंह की खानी पड़ी है। 2025 जाते-जाते फिलिस्तीन प्रतिरोध के समक्ष इजरायल को और यूक्रेन-रूस युद्ध में यूरोप तथा रूस को समझौते की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा है।

दुनिया में युद्ध विरोधी माहौल बन रहा है। यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया तक शांति की नई शक्तियों का जन्म हुआ है। जिसमें यूरोप के शांति प्रिय नागरिक अग्रिम कतार में खड़े हैं। अमेरिका में भी युद्ध के विरोध और दक्षिणपंथी हमले के खिलाफ प्रतिरोध की ताकतें विकसित हो रही हैं। इसका बुनियादी कारण है कि पश्चिमी पूंजीवादी व्यवस्था गहरे आर्थिक संकट में फंस गई है।

अमेरिकी नेतृत्व में बने उदारवादी विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के संकट ग्रस्त हो जाने के कारण पश्चिम में दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तियों का भी उभार दिखाई दे रहा है। जो समावेशी यूरोपीय समाज के लिए गंभीर चुनौती है। अमेरिका यूरोप से आस्ट्रेलिया तक प्रवासी विरोधी माहौल बन रहा है। जिसमें भारतीय मूल एक नागरिक के तौर पर निशाने पर हैं। यह परिस्थिति दक्षिणपंथी ताकतों के पुनर्जीवन का संकेत दे रही है। जिससे दुनिया में नए राजनीतिक संकट पैदा होंगे। क्या यूरोप 1930 के दशक की तरफ लौट रहा है। 2025 जाते-जाते यह यक्ष प्रश्न को पश्चिमी लोकतांत्रिक व्यवस्था के समक्ष छोड़ गया है।

2025 भारतीय उपमहाद्वीप के लिए चुनौतियों भरा वर्ष रहा है। जहां श्रीलंका और बांग्लादेश के जनविद्रोहों की श्रृंखला आगे बढ़ती हुई नेपाल में जेन- जी क्रांति के रूप में ठोस शक्ल ली। जिसमें कम्युनिस्ट सरकार हवा में उड़ गई। इस दौर में हमने न्यू जनरेशन को अपनी दावेदारी पेश करते हुए देखा है। जो रोजगार सम्मानजनक जीवन और आजादी के परचम तले संगठित होकर सड़कों पर उतरा है। जिसने दक्षिण पंथ की विभाजनकारी नीतियों को भारी चोट पहुंचाई और कुछ देशों में आकर ले रही लोकतांत्रिक तानाशाही को पीछे धकेल दिया। श्रीलंका और बांग्लादेश इसके ताजा उदाहरण हैं। जहां इस जन उभार ने लोकतांत्रिक आकांक्षा को जन्म दिया है। लेकिन ठोस वर्गीय और राजनीतिक दिशा न होने से अराजकता के नए दौर शुरू हो गए हैं। जो चिंताजनक है। 

‌‌भारत-बांग्लादेश पाकिस्तान में टकराव बढ़ने से भारतीय उप महाद्वीप में आंतरिक संकट का विस्तार हुआ है। बांग्लादेश में युवा विद्रोह के बाद अस्तित्व में आई सरकार ने मार्च में चुनाव कराने की घोषणा की है। जिससे उथल- पुथल और सांप्रदायिक टकराव बढ़ने से आंतरिक व्यवस्था चरमरा गई है। विद्रोह की अगुवाई करने वाले युवा नेताओं की हत्या ने स्थिति को जटिल बना दिया है। इस हालत में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का खतरा बढ़ गया है।

भारतीय उप महाद्वीप के देशों में आर्थिक सामाजिक राजनीतिक अस्थिरता के बढ़ने से लोकतांत्रिक व्यवस्था संक्रमण से गुजर रही है। इन देशों में अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्गों के लिए नई त्रासदी जन्म ले रही है। 2025 में भारत के अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते और कमजोर हुए हैं। जिससे इन देशों में सांप्रदायिक नस्लीय और कट्टरपंथी ताकतों की साम्प्रदायिक विध्वंसक कार्रवाइयों को वैधता मिल रही है। जो उपमहाद्वीप में लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी परिवेश के निर्माण के लिए खतरनाक संकेत है।

पहलगाम के आतंकी हमले के जवाब में भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किए जाने के बाद दक्षिण एशिया में नए सैन्य शक्ति संतुलन के संकेत दिखाई दिए। जहां पहली बार चीन सैन्य शक्ति के रूप में प्रकट हुआ। जिसने पाकिस्तान के पक्ष में युद्ध के पलड़े को झुका दिया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय उप महाद्वीप में अमेरिकी दखल और बढ़ गई है। ट्रंप द्वारा युद्ध रुकवाने की घोषणा ने भारत सरकार को संकट में डाल दिया है और मोदी मार्का विदेश नीति का खोखलापन उजागर हो गया है। सम्पूर्ण घटनाक्रम ने संघनीति मोदी सरकार की वैचारिक सैद्धांतिक रणनीतिक दरिद्रता और खोखलेपन को उजागर कर दिया है।

हिंदुत्व की बुनियादी सोच में मौजूद प्रतिगामी छिछलापन और विश्व पूंजीवाद के गति विज्ञान की अज्ञानता ने भारत की स्थिति को दयनीय बना दिया है। संघ नीति मोदी सरकार की वैचारिकी में साम्राज्य वादी पूंजी के हमले से पैदा होने वाले राजनीतिक और आर्थिक संकट से टकराने की क्षमता नहीं है। हिंदू राष्ट्रवाद‌ समर्पण वादी राष्ट्रवाद है। जिसे उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष से लेकर अमेरिकी साम्राज्यवाद के समक्ष समर्पण करने की निरंतरता में देखा जा सकता है।

संघी राष्ट्रवाद की आंतरिक प्रवृत्ति और चिंतन प्रक्रिया में ही शक्तिशाली शक्ति के समक्ष समर्पण की स्वाभाविक प्रवृत्ति मौजूद है। यहां ऐतिहासिक तौर पर कोई व्यतिक्रम दिखाई नहीं देता है। यानी हिंदू राष्ट्रवाद का आधुनिक साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद से दूर तक कोई  रिश्ता नहीं है। 2025 ने तथाकथित मजबूत और राष्ट्रभक्त मोदी सरकार के प्रचार तंत्र द्वारा खड़ा किए गए झूठ को ट्रंप की एक घुड़की के सामने बिखरते हुए देखा है।

2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को भारी धक्का लगा था। इंडिया गठबंधन की एकजुटता के कारण मोदी सरकार अल्पमत में आ गयी थी। स्पष्ट है कि सांप्रदायिक उन्माद और राष्ट्रवादी तूफान के पीछे हटने के बाद जिंदगी के कटु यथार्थ ने आम आदमी की जिंदगी को घेर लिया। कोरोना के समय मोदी सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों से उत्पादक शक्तियों के हुए विनाश ने देश को और अधिक संकट में डाल दिया था। जो नोटबंदी जीएसटी और कॉर्पोरेट परस्त नीतियों के कारण पहले से ही संकट से जूझ रहा था। मैन्युफैक्चरिंग का ढांचा चरमरा गया। रोजगार के अवसर खत्म हो गये।

देसी विदेशी कर्ज आसमान छूने लगा। देश को चौतरफा आर्थिक संकट  घिर गया। युवा बेरोजगारी और किसानों  की आत्महत्या बढ़ गई। मज़दूरों की छटनी और गांवों से श्रम शक्ति के पलायन में गुणात्मक बदलाव देखा गया। सामूहिक आत्महत्या की प्रवृत्ति जन्म ली। कृषि पर आबादी का बोझ बढ़ा। दलितों अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर होने वाले हमलों ने भारतीय समाज को जटिल संकट में फंसा दिया है।जिसका प्रभाव 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखाई दिया था ।

लेकिन 2025 में महाराष्ट्र हरियाणा और उसके पहले छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश राजस्थान के चुनाव परिणामों के बाद भाजपा ने पुनः वापसी कर ली। बिहार चुनाव तक आते-आते भारतीय लोकतंत्र के चरित्र में ही बुनियादी बदलाव दिखाई देने लगा है। पहली बार 2014  में भारत के चुनाव में कॉर्पोरेट घरानों का नग्न हस्तक्षेप देखा गया। भाजपा की विजय के पीछे कॉर्पोरेट शक्तियों के साथ खुला गठबंधन और षड्यंत्रों की पूरी श्रृंखला काम कर रही थी।

जो शासक वर्गों के अंदर मौजूद अंतर विरोध के तीव्र होने का संकेत था। मोदी सरकार आने के बाद शासक वर्गों का आपसी समन्वय भंग हो गया है और टकराव के नए-नए क्षेत्र बन रहे हैं। इसको नियंत्रित करने के लिए मोदी सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा करना शुरू किया। लगभग सभी संस्थाएं समर्पण कर चुकी हैं और इन्हें लोकतंत्र को ध्वस्त करने के लिए सुनियोजित ढंग से प्रयोग किया जा रहा है। मोदी राज में राज्य मशीनरी को अस्त्र के बतौर इस्तेमाल करने की क्रूर शुरुआत हुई। जिससे स्थिति जटिल और बदतर होती जा रही है। जिस कारण भारत में लोकतंत्र के भविष्य को लेकर आशंकाएं बढ़ी हैं।

 2025 में यह आशंका यथार्थ में बदलती दिखी है। जब बिहार में चुनाव के ठीक पहले एस आई आर द्वारा 70 लाख से ज्यादा मतदाताओं को मतदान से वंचित कर दिया गया और  चुनाव के पहले नई योजना लॉन्च कर एक करोड़ से ज्यादा महिलाओं के खाते में दश‌ हजार रुपए डाले गए। जिसने स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया को बेमानी बना दिया। वोट चोरी के खुलासे और बिहार चुनाव के परिणाम आने के बाद पिछले डेढ़ वर्षों में हुए सभी राज्यों के चुनाव की वैधता संदिग्ध हो गई है। इसलिए भारत में चुनाव की विश्वसनीयता खत्म हो गई है। कुछ हलकों की तरफ से चुनाव बहिष्कार तक की बातें होने लगी हैं। जो चिंताजनक हैं।

मोदी सरकार की खुली पक्षधरता कुछ कॉर्पोरेट घरानों के प्रति दिखाई देती है।2025में असम से लेकर बिहार झारखंड छत्तीसगढ़ और अब अरावली की पहाड़ियों को जिस तरह से एक कॉरपोरेट घराने को सौंपने के कदम उठाए गए हैं। उससे भारत क्रोनी केपिटलिज्म अब ओलार्गी के स्तर पर विकसित हो चुकाहै ।इसके खिलाफ आंदोलन की नई  लहरें उठ रही हैं।

संसदीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता वह बुनियादी आधार है ।जिस पर लोकतंत्र की नीव टिकी होती है ।लोकतंत्र अपनी इसी विशेषता के कारण पहचाना जाता है ।जहां नागरिकों को स्वतंत्र निष्पक्ष और भय मुक्त मतदान करने की गारंटी हो। सभी विपक्षी पार्टियों को लेविल प्लेयिंग की फील्ड मिले।

अगर लोकतंत्र में समान अवसर खत्म हो जाता है ।तो लोकतंत्र की वैधता अपने आप समाप्त हो जाती है।लेकिन मोदी सरकार ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से लेकर उसे संवैधानिक जवाब देही से मुक्त कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही संदेह के घेरे में ला दिया है। साथ ही कॉरपोरेट पूंजी का प्रवाह जिस तरह भाजपा की तरफ हुआ है। उसने राजनीतिक पार्टियों के बीच आर्थिक संतुलन को ही ध्वस्त कर दिया है। इसलिए 2025 की सबसे महत्वपूर्ण परिघटना चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का संदिग्ध हो जाना है। 

राज्य दर राज्य होने वाले चुनाव के परिणामों ने चुनाव प्रक्रिया पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। विपक्ष सीधे वोट चोरी का सवाल उठा रहा है। मतदाता सूची के तैयार करने से लेकर चुनाव संचालित करने वाली संस्थाओं तक को मोदी सरकार ने हथियार में बदल दिया है। जिससे लोकतंत्र की वैधता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया। बिहार चुनाव तक आते-आते यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली दम तोड़ रही है।

चुनाव आयोग को वस्तुत: भाजपा आयोग में बदला गया और नियुक्ति प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव आयोग को 2023 में दी गई कानूनी संरक्षण ने चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता को समाप्त कर दिया गया है। आश्चर्य यह है विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे किसी भी सवाल का जवाब न चुनाव आयोग देने के लिए तैयार है और न सरकार। बिहार चुनाव के बाद भारत में इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी अब यथार्थ बन गई है। 

मतदाता निर्धारण की पूरी प्रक्रिया जिसे एसआईआर द्वारा संचालित किया जा रहा है। लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत को ही पलट दिया है। अब सरकारें वोटर चुनेंगी न कि मतदाता सरकार का चयन करेंगे। करोड़ों लोगों का मताधिकार छीनकर उन्हें मतदान अधिकार से वंचित करना वस्तुत: आरएसएस के दो तरह के नागरिक निर्माण की सुचिंतित परियोजना का अभिन्न अंग है। जो हिंदुत्व फासीवाद के बहु प्रतीक्षित लक्ष्य की दिशा में बढ़ने की अनिवार्य शर्त है। मतदाता का अधिकार छीनने की प्रक्रिया को” रक्तहीन नरसंहार” कहा जा रहा है। जिसके द्वारा अल्पसंख्यकों दलितों  आदिवासियों और जनजातीय समूह को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की प्रक्रिया चल रही है। यह बहुभाषी बहुधर्मी बहु जातीय और सांस्कृतिक बहुलता वाले भारत की एकता के लिए एक खतरनाक संकेत है। 

याद रखें असम से शुरू हुआ नागरिकता तय करने का सवाल अब उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी चल रहा है। जहां मुख्य मंत्री डिटेंशन सेंटर बनाने की बात कर रहे हैं। संघ के जन्म काल से ही उसकी नीति रही कि हिंदू धर्म संस्कृति के बाहर के लोगों को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर उनके मताधिकार सहित संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित कर देना। 2025 मैं मोदी सरकार इस दिशा में सधे कदमों से आगे बढ़ रही है।

इस देश में दो तरह के  नागरिक और उनके लिए दो तरह के कानून साफ-साफ दिखाई दे रहा हैं। पिछले 12 वर्षों में संघ और मोदी के प्रति  प्रतिबद्धता के आधार पर ही प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया के संचालित होने का लक्षण दिखाई दे रहे हैं। यह विभाजन धर्मों क्षेत्रों सरकारों के स्तर तक पहुंच गया है। केंद्र सरकार द्वारा विपक्षी सरकारों के प्रति भेदभाव, राज्यपालों की समानांतर सरकार चलाने की प्रवृत्ति तथा जांच एजेंसियों की मोदी सरकार के प्रति पक्षधरता ने स्थिति को जटिल बना दिया है। जिससे राज्यों के मध्य समन्वय और संतुलन डगमगा गया है।2025 में इस संतुलन के खत्म होने का वर्ष बन गया।

2025 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष है। संघ के हिंदू राष्ट्र को ठोस रूप से धरातल पर उतारने के लक्ष्य को हासिल करना वर्तमान मोदी राज्य में “अभी नहीं तो कभी नहीं “वाली स्थिति में पहुंच गया है। 2024 के लोकसभा चुनावों के जनादेश से डरा हुआ हिंदुत्व गैंग वर्तमान अवसर को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता। संघ प्रमुख देश में घूम-घूम कर भारत को हिंदू राष्ट्र बता रहे हैं ।उनका कहना है कि भारत हिंदू राष्ट्र है ही ।

इसे संविधान में या कहीं और घोषित करने की जरूरत नहीं है। इसके साथ वह भारत के लोकतांत्रिक चरित्र (जो भी थोड़ा बहुत दिखाई देता  है) को बदलकर धर्म आधारित राज्य बनाने की परियोजना को आगे बढ़ाने का यत्न कर रहे हैं। उनके हर प्रवचन में भारत की विविधताओं को नकारते हुए बहुसंख्यकवादी  विचारों को उद्दंडता पूर्वक हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र पर आरोपित किया जाता है। संघके शताब्दी वर्ष में संघ और मोदी दोनों ने लोकतांत्रिक पाखंड के आवरण को उतार कर फेंक दिया है और कर खुलकर असली रूप में सामने आ गये हैं।  इस समय  यह तय कर पाना मुश्किल है कि मोदी धर्म गुरु है , पुजारी  हैं या लोकतांत्रिक भारत के प्रधानमंत्री।

2025  के आखिरी 10 दिनों में घटित घटनाओं ने देश को हिला कर रख दिया है।त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की नस्लीय मॉबलिंचिंग और 24 -25 दिसंबर को क्रिसमस मनाते हुए ईसाइयों पर बीजेपी राज्यों में बजरंग दलके गुंडों द्वारा ‌हुए संगठित हमलों  ने भारत के लोकतांत्रिक मानस को झकझोर दिया है ।संघ परिवार द्वारा पाले पोसे गये गुंडे कानून के भय से मुक्त हो कर बरेली में बर्थडे पार्टी मना रही लड़की के मित्रों पर मुसलमान होने के नाते हमला कर के वीडियो बनाकर वायरल कर देते हैं।

दूसरी तरफ मोदी के क्वेटो (काशी) में गंगा के घाट पर जापानी पर्यटकों के साथ किया गया दुर्व्यवहार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। मोदी एक तरफ का चर्च में जाकर प्रार्थना करने का दिखावा कर रहे हैं ।तो दूसरी तरफ इस बर्बरता के खिलाफ खतरनाक अवसरवादी चुप्पी ओढ़ लेता है। इसने लोकतांत्रिक मानस को झकझोर दिया है ।इन घटनाओं से नॉर्थ ईस्ट से लेकर विश्व मंच पर भारत  कटघरे में खड़ा है। इन नस्लीय मजहबी बर्बरताओं की गूंज विदेशी मीडिया तक में सुनायी दे रही है। जहां संघी फासीवाद विरोधी अभियान चल रहा है और संघ की छवि निर्माण की कोशिश तार-तार हो गई है। एक प्रतिष्ठित अखबार ने तो हिन्दू राष्ट्रवादी अभियान को धूर्तों और गुंडों का आश्रय स्थल तक कहा है।

2025 ने घटी दोनों घटनाओं से मोदी सरकार के बुनियादी चरित्र को राष्ट्र के समक्ष नंगा हो गया है।

 एक- नग्न मित्र कॉर्पोरेट परस्ती 

दूसरा- हिंदू राष्ट्र के आवरण में फासीवादी निजामके निर्माण की रणनीति। जिससे संविधान लगभग निष्प्रभावी कर दिया गया है। संघ परिवार  संविधान के निर्माण और लागू होने का विरोधी रहा है। भारतीय संस्कृति सभ्यता और औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति के नाम पर संविधान को अप्रासंगिक बनाने का अभियान जारी है।यह खतरनाक सच्चाई भारतीय जन गण के समक्ष उजागर होने से बेचैनी बढ़ गई है। खासकर दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों और एथेनिक समूहों में यह बेचैनी  स्पष्ट दिखाई दे रही है।

जिस कारण से संविधान और लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए भारतीय समाज की अतल गहराइयों में चल रही अंत: क्रियाओं की कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के साथ सीधे मुठभेड़ शुरू हो गई है। इस मुठभेड़ में नौकरशाही से लेकर न्यायपालिका तक सब शामिल हो चुके हैं। लगता है यह संघर्ष भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से भी ज्यादा विराट और रचनात्मक होने जा रहा है ।इस संघर्ष के अंदर छिपी लोकतंत्र और न्याय पूर्ण समाज हासिल करने की संभावनाएं 2025 के अंत में स्पष्ट आकार लेने लगी हैं।

ऐसा लगता है की स्वतंत्रता आंदोलन की सभी प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष  लोकतांत्रिक समाजवादी और सामाजिक न्याय की धाराएं और संगठन इस संघर्ष की आग में तप कर एकताबध्द होंगे। इसके स्पष्ट संकेत 25 दिसंबर 2025 के बाद घटित हुई  घटनाओं के खिलाफ चल रहे संघर्षों से मिलने लगे हैं।

जिसे हम सुप्रीम कोर्ट द्वारा मोदी सरकार की कॉर्पोरेट परस्ती को ठोस शक्ल देने के उद्देश्य से अरावली पहाड़ियों की ऊंचाइयां तय करने के खिलाफ उठे जन आक्रोश में देख सकते हैं। जब चार राज्यों के किसानों मजदूरों प्रगतिशील नागरिकों के साथ-साथ इस देश में कारपोरेट लूट के खतरे को समझने वाले पर्यावरणविदों तक की भागीदारी ने आंदोलन को नया आयाम दे दिया। जिससे न्यायपालिका को पीछे हटना पड़ा। 2025 में जाकर पहली बार भारत में पर्यावरण का सवाल लोकतंत्र और कारपोरेट लूट विरोध का एजेंडा बन रहा है।

अब भारतीय नागरिक कारपोरेट लूट की हवस से होने वाले पर्यावरणीय पारिस्थितिकी और जैविक विविधता के नुकसान को समझने लगे हैं। तथा इसे भारत के समाज के लिए गहरे संकट के रूप में देख रहे हैं। अब जल जंगल जमीन के साथ पर्यावरण सुरक्षा का सवाल सिर्फ प्रभावित लोगों यानी ग्रेट निकोबार हंसदेव अरण्य सिंगरौल पीरपैंती छत्तीसगढ़ और असम के आदिवासियों व नागरिकों का ही का सवाल नहीं रहा ।यह भारत  के लोकतंत्र के साथ समाज और पर्यावरण बचाने का एजेंडा बन चुका है।

दूसरी तरफ एक बार फिर उन्नाव की बेटी का सवाल महिलाओं की व्यापक सुरक्षा सम्मान और उनकी अस्मिता से जुड़ गया है।जैसे ही न्यायालय पर दबाव डालकर हत्या बलात्कार की सजा भुगत रहे भाजपाई नेता कुलदीप सिंह सेंगर को सजा मुक्त करने की कोशिश हुई।वैसे ही नागरिक समाज सचेत हो गया।अब उत्तराखंड की बेटी अंकित भंडारी का सवाल भी एजेंट पर आ गया है।

छिपे हुए रहस्य खुलने लगे हैं तथा महिलाएं 2025 में अपनी संपूर्ण मेधा क्षमता ऊर्जा और अपनी स्वतंत्रता के झंडे के साथ भारतीय रंग मंच पर दस्तक देने लगी है। दमन उत्पीड़न के बाद भी योगिता  भयाना सहित हजारों छात्र नौजवान महिलाएं सड़कों पर उतरीं। जिसने 2025 के  समाप्त होते-होते भारत में महिलाओं की बराबरी आत्म सम्मान और इज्जत की सुरक्षा के सवाल को पितृ सत्तात्मक हिंदुत्व वादी फासिस्ट सत्ता के समक्ष पेश कर दिया है।

स्पष्ट है कि 2026 दमन के खिलाफ प्रतिरोध, फासिस्ट तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र, नस्लीय भेदभाव के जवाब में अस्मिता सम्मान की सुरक्षा और सांप्रदायिक उन्माद के प्रतिरोध में धर्मनिरपेक्षता, भेदभाव की वैचारिकी की निषेध पर निर्मित न्याय पूर्ण समाज और  बहुसंख्यक बाद के डंडे के खिलाफ कानून के राज्य की लड़ाई का गवाह बनने जा रहा है।

2025 के आखिरी सप्ताह में संसद भवन और न्यायपालिका की लौह दीवार से बाहर निकल कर अरावली की पहाड़ियों से नई ऊर्जा ग्रहण करते हुए इंडिया गेट जंतर-मंतर पर लड़ी गई लड़ाई ने जिस तरह से फासिस्ट ताकतों को पीछे धकेल है। उससे एक बार यह और सिद्ध गया है कि जनता की बुनियादी अधिकारों की लड़ाई अंततः खेतों खलिहानों को पहाड़ों गलियों और सड़कों  पर ही लड़ी जाएगी ।

आने वाले 2026 का भारत के 140 करोड़ नागरिकों को इसी अनुभव की रोशनी में स्वागत  के लिए तैयार रहना चाहिए।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)

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